कृपया जान लीजिये कि संक्रान्ति अब 15 जनवरी को क्यों हो रही है


कृपया जान लीजिये कि संक्रान्ति अब 15 जनवरी को क्यों हो रही है?

वर्ष 2008 से 2080 तक मकर संक्राति 15 जनवरी को होगी।
विगत 72 वर्षों से (1935 से) प्रति वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही पड़ती रही है।

2081 से आगे 72 वर्षों तक अर्थात 2153 तक यह 16 जनवरी को रहेगी।

ज्ञातव्य रहे, कि सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश (संक्रमण) का दिन मकर संक्रांति के रूप में जाना जाता है।

इस दिवस से, मिथुन राशि तक में सूर्य के बने रहने पर सूर्य उत्तरायण का तथा कर्क से धनु राशि तक में सूर्य के बने रहने पर इसे दक्षिणायन का माना जाता है।

सूर्य का धनु से मकर राशि में संक्रमण प्रति वर्ष लगभग 20 मिनिट विलम्ब से होता है। स्थूल गणना के आधार पर तीन वर्षों में यह अंतर एक घंटे का तथा 72 वर्षो में पूरे 24 घंटे का हो जाता है।

यही कारण है, कि अंग्रेजी तारीखों के मान से, मकर-संक्रांति का पर्व, 72 वषों के अंतराल के बाद एक तारीख आगे बढ़ता रहता है।
यह धारणा पूर्णतः भ्रामक है, कि मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को आता है।           
 विशेषकर उत्तराखंड में इस सक्रांति का बहुत महत्व है। यहां के गांव में आज गायों को भीमल आदि का हरा चारा दिया जाता है साथ ही आज शाम को गेहूं के आटे का घी के साथ हलवा बनाया जाता है।
      यह संंक्रान्ति कुमाऊं में घुघुतिया त्यौहार के नाम से सुप्रसिद्ध है यहां आटे के घुघुतिया बनाकर कौओं को खिलाए जाते हैं और साथ ही एक गाना गाया जाता है काले कौवा काले मुक्ति माला खा ले पूस की रोटी माघ में खा ले।
     इसी दिन उत्तराखंड में केशव प्रयाग विष्णुप्रयाग नंदप्रयाग कर्णप्रयाग रुद्रप्रयाग देवप्रयाग और हरिद्वार में संगम पर स्नान करने की परंपरा है। प्रयागराज में भी लाखों की संख्या में लोग कल सुबह स्नान करेंगे।
     उत्तराखंड में मकर संक्रांति माघ की संक्रांति को खिचड़ी संक्रांद के नाम से भी जाना जाता है यह पर्व ब्राह्मणों में खासा लोकप्रिय है और यहां के ब्राह्मण पूर्वकाल में अपनेे यजमान के घर जाकर दाल चावल का दान लेते हैं। लेकिन अब यह परंपरा समाप्त हो गई है। यहां तक कि प्रयागों पर स्नान की परंपरा भी उत्तराखंड के कई प्रयागों से लुप्त सी हो रही है। इसी दिन 3 महीने पाताल लोक में प्रवास के बाद भगवान विष्णु इस धरती पर अवतरित होते हैं। इसलिए कल से शालिग्राम भी तुलसी की जड़ से निकाल घर के पूजा के स्थानों में रखे जाते हैं।
     इसी माघ की वसंत पंचमी को नया पंचम पातड़ा पढ़कर सुनाया जाएगा और नए सकरकाल की ऋतु और राशियों का फलादेश भी बताया जाता है

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